Nature Focused Development : प्रकृति केंद्रित विकास
स्वाभिमान पार्टी के उद्देश्य:
(1) नशा मुक्त व्यक्ति (2) विष मुक्त खेती (3) भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति

प्रकृति केंद्रित विकास : Nature Focused Development
प्रकृति केंद्रित विकास (Nature Focused Development) के इन तीन शब्दों पर यदि ध्यान दें, तो विकास का विशेषण हुआ “प्रकृति केंद्रित”। इसलिए सबसे पहले विकास यानी क्या? यही स्पष्ट होना आवश्यक हो गया है। जैसे कोई दुबला-पतला व्यक्ति है और उसका कुछ वजन बढ़ जाए, वह कुछ मोटा हो जाए, तो वह विकास है। परंतु यदि वही व्यक्ति अधिक मोटा हो जाए तो? यदि किसी को हाथी-पांव हो जाए, फाइलेरिया हो जाए तो? क्या उसका बहुत विकास हो गया? नहीं, ऐसा कोई नहीं कहेगा।
इसी प्रकार विकास के संबंध में बात की जाए, तो जैसा वह स्वभाव में स्थित है, अपने भाव में स्थित है, तो वह स्वस्थ है। यानी स्वयं में स्थित रहे, तब तो वह स्वस्थ कहा जाएगा, लेकिन यदि ऐसा न हो, तो उसे विकास कैसे कहेंगे?
जब हम ‘विकास’ की बात करते हैं, तो हमारा अभिप्राय देश से और देशों से होता है। विकास शब्द से हमारा ताल्लुक कुछ राष्ट्रीय, सामाजिक और मानवीय विकास से होगा। अब तक विकास के मापक शब्दों के रूप में हमने कई शब्द सुन रखे हैं। जैसे पर कैपिटा इनकम, ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स, गरीबी रेखा आदि आदि।
हमने ये शब्द दशकों से सुने हैं और सरकारों को इन्हीं आधार पर अब तक काम करते, चलते हुए देख रहे हैं। इन शब्दों को तथाकथित विकसित देशों ने अपने अनुरूप विकसित किया और प्रचारित-प्रसारित किया। विकासशील देशों ने इन्हीं के आधार पर, अपने देश के पैमानों के बारे में बिना कुछ सोचे समझे, इसे स्वीकार कर लिया।
परिणाम ये रहा कि विकसित दिखने की राह में चलते हुए भुखमरी, बेरोजगारी, हिंसा, लूट, अपहरण, बलात्कार, फिर हथियारवाद और सरकारवाद! इस रूप में नया विकास सामने आ गया। विकास, यानी सुविधा प्राप्त करना और जीवन उसी सुविधा को बढ़ाते हुए बिता देना, समाप्त कर देना, ऐसी मनोदशा विकसित कर दी गई।
फिर सत्ता से पैसा और पैसों से सत्ता प्राप्ति भी इसी बात का परिणाम है। जैसे-जैसे विकास बढ़ा, वैसे-वैसे महारोग भी बढ़ गए। पैसे वाला और अधिक पैसा प्राप्ति की तरफ बढ़ा, तो गरीब और भी अधिक गरीब होते गए। पूरा विश्व खरीदो और बेचो की मानसिकता की ओर बढ़ता चला गया है।
अब जाकर समझ में आया कि मात्र शरीर को स्वस्थ रखने और केवल शरीर के सुख के लिए सुविधा बढ़ाने से ही काम नहीं चलेगा। क्योंकि शरीर और मन का रिश्ता है। और शरीर केवल शरीर ही नहीं, बल्कि मन, बुद्दि और आत्मा का समुच्चय है। इसीलिए मनुष्य खुशी, दुःख और तकलीफ के भाव भी व्यक्त करता है।
अधिक विचार करने पर यह बात भी समझ आती है कि यदि शरीर को स्वस्थ रखना है, तो श्रम की आवश्यकता है। अस्वस्थ व्यक्ति को भी व्यायाम की सलाह ही दी जाती है, ताकि वह जल्दी स्वस्थ हो। यदि श्रम नहीं रहा, तो रोग बढ़ेंगे। यदि परिश्रम का उचित फल नहीं मिला, तो भी समस्या खड़ी होगी।
ऐसे में हम जितना मनुष्यत्व और प्रकृति के करीब होकर जिएंगे, उतना ही अच्छे प्रकार का जीवन स्तर पा सकेंगे। इसलिए समत्व में जीवन जीना ही मनुष्यता है। फिर विकास के कई पहलू हैं। जैसे यदि केवल खाने को और पहनने को मिल गया, तो क्या विकास हो गया? फिर बाकी चीजें भी तो चाहिए। शिक्षा, संस्कार और अपनी चाहतों को पूरा करने के भी तो अवसर चाहिए।
इसलिए विकास का दूसरा पहलू भी है। विकास का अर्थ केवल भौतिक समृद्धि नहीं हो सकता। समृद्धि के साथ-साथ यदि आतंरिक विकास नहीं हुए, तो उसे विकास नहीं कहा जा सकता। विकास के साथ-साथ हमें अपने जीवन में भी समाधान चाहिए।
अतः सुख की परिभाषा केवल शारीरिक नहीं हो सकती। ऐसी ही स्थिति समाज और देशों की भी होती है। जिसे हम आतंरिक विकास कहते हैं, उसे ही सामान्य शब्दों में संस्कृति कहा जाता है। तो बाहरी विकास का अर्थ है ‘समृद्धि’ और आतंरिक विकास का अर्थ है ‘संस्कृति’।
अब ये बातें सच हैं, तो फिर ‘समृद्धि’ यानी ‘भौतिक’ और ‘संस्कृति’ यानी ‘प्रकृति से ऊंचा’ होना है। एक उदाहरण से हमें समझना होगा कि खाना खा लेना प्रकृति है। छीन कर खाना विकृति है, लेकिन बांटकर खाना ही संस्कृति है। जब कहा जाता है कि भारत की अपनी संस्कृति है, सभ्यता है, तो वहां इन्हीं अर्थों में हमें अपनी पहचान को समझना होगा।
यही सनातन संस्कृति भारत के वेदों ने और समस्त ऋषि-मुनियों ने हमें प्रदान की है। इसी के आगे हम “वसुधैव कुटुंबकम” की बात समझ सकते हैं। इसी आधार पर भारतीय समाज की स्थापना है। इन्हीं आधारों पर धर्म, अर्थ आदि की रचना हुई है। इन्हीं तत्वों से राजनीति और समाज नीति बनी है।
इन्हीं बातों से भारत का परिवार चलता है, न कि राजनीति परिवार चलाती है। मनुष्य यदि देवता की तरह हो जाए और समाज हित में कार्य करें, तो ये विकास कहलाएंगे, यदि केवल अपने लिए करें, किसी का भला न करें और फिर मौका मिले तो नष्ट कर दें, तो इसे विकास नहीं माना जाएगा। यह तो विकृति ही कही जाएगी।
दरअसल विकास के संबंध में जो पश्चिमी सोच है, वह शोषणमूलक, विषमतामूलक, अमानवीय और अप्राकृतिक है। मानव की सुविधाओं के लिए अधिक से अधिक उत्पादन और फिर उसका उपभोग ही विकास माना जाने लगा है। भारत के “संतोष ही परम सुख है” की बात को भ्रांति बताकर प्रचारित किया गया।
करोड़ों वर्षों के भारत की रहन-सहन और विचार-व्यवहार के तरीकों को गलत सिद्ध करने की होड़-सी मच गई। अपने ही जीवन के प्रति नफरत का भाव पैदा करने के षड्यंत्र में देश की चुनी हुई सरकारों ने भी पूरा साथ दिया। ऐसा क्यों है?
हर बात के पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इन सब बातों की रचना पॉलिटिक्स और इकोनॉमिक्स की तरफ बढ़ी। तबाही की तरफ बढ़ी। अन्यों के विनाश के तरफ बढ़ी। मानवता और प्रकृति के विनाश की तरफ बढ़ी। हिरोशिमा में गिराया गया ऐटम बम इसी तथाकथित ‘विकास’ का परिचायक है।
बड़े विकास हुए, तो अब थोक में मरने वालों की संख्या भी बढ़ गई। एके 47 और एके 56 का भी आविष्कार हुआ। यह भी बड़ा विकास है। इन बातों का अर्थ है कि जितनी तेज मौत और जितनी बड़ी संख्या में मौत, उतना बड़ा विकास। तो मानव जाति की समाप्ति पर बढ़ता कदम ही आज के लिए ‘विकास’ है।
यह सब कुछ मानवीय संवेदनाओं के अभाव के कारण ही हो सका है। इसलिए जीव जगत के साथ-साथ जगदीश के तत्व को नकारना इस पूरी समस्या का मूल कारण है। प्रकृति से ऊपर होने का यह अर्थ नहीं है कि सब कुछ दुनिया में केवल मनुष्य के लिए ही बना या बनी है।
मनुष्य इस प्रकृति का नियंता नहीं है। जितना इस प्रकृति से ले, उससे अधिक वापस लौटाने की जिम्मेदारी है मनुष्य की। मनुष्य ने धरती नहीं बनाई है। न ही ये पहाड़, ये जंगल, ये नदियां और ये झरने। ये सब प्राकृतिक हैं। तो फिर सारी सृष्टि ही मनुष्य के लिए ऐशगाह है, ऐसा विचार ही अप्राकृतिक है।
अपनी सुविधा के लिए जंगल को काटकर खत्म कर दिया जाए, नदियां मोड़, काट दी जाएं, पक्षियों का कोई स्थान ही न बचे, उनके वंश समाप्त हो जाएं, क्या हर्ज है? ऐसी मानसिकता ही अप्राकृतिक है। ऐसे में सृष्टि से परस्परानुकूलता का भाव ही समाप्त हो जायेगा।
इसलिए संतुलन की आवश्यकता है। यही भारतीय जीवन शैली है। इसीलिए कहा गया है कि “साईं इतना दीजिए जामे कुटुम समाय, मैं भी भूखा ना रहूँ, साधू न भूखा जाए”। कितना शुद्ध और महान दर्शन है भारतीय संस्कृति का, समता का, बराबरी का।
भारत में यदि गऊ को माता कहा जाता है, तो सर्वगुण संपन्नता के कारण। भारत में तो घर की माता, धरती माता और गऊ माता का ही चक्र है। यही देवी चक्र तो घर-घर में पूज्य है। इसीलिए प्रकृति में हर एक का स्थान है, ये भाव नहीं रहा तो कैसा विकास?
समृद्धि जबतक संस्कृति कि सेज में नहीं आएगी, तब तक समृद्धि नहीं मानी जाएगी। प्रकृति में हर एक का अपना बराबर अधिकार और हिस्सा है। कोई किसी का अधिकार न छीने। सभी को जीने का समान अधिकार है, इसीलिए ‘अब जियो और जीने दो’ के स्थान पर हमारा नारा होना चाहिए – “जीने दो, फिर जियो”।
यदि संस्कृति आधारित भारत का विकास हुआ, तो हम गर्व से कह सकेंगे कि हमने पुनः राम-राज्य प्राप्त कर लिया है। इसलिए स्वाभिमान पार्टी मानव केंद्रित विकास कि अवधारणा को नकारते हुए भारतीय संस्कृति आधारित विकास कि परिकल्पना के आधार पर “प्रकृति केंद्रित विकास” को स्वीकार करती है।